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व्यापार

केंद्रीय बैंक के नए नियम से पीएफसी और आरईसी पर ज्यादा बोझ पड़ने की आशंका

नई दिल्ली। परियोजनाओं को कर्ज देने की मौजूदा नीति में बदलाव करने के आरबीआई के प्रस्ताव से देश का बैंकिंग सेक्टर काफी असहज है। बैंकों ने इस बारे में आरबीआई से और ज्यादा स्पष्टीकरण की मांग की है और यह इच्छा भी जताई है कि संबंधित प्रस्ताव को लागू करने से पहले उनके साथ विस्तार से विमर्श किया जाएगा। इस प्रस्ताव के मुताबिक बैंक, एनबीएफसी, सहकारी बैंक समेत हर तरह के वैसे वित्तीय संस्थान जो परियोजनाओं को कर्ज देते हैं, को कुल वितरित कर्ज का पांच प्रतिशत अतिरिक्त राशि का समायोजन एक विशेष खाते में करना होगा। इससे इनकी कर्ज देने की लागत के बढ़ने की संभावना जताई रही है। सरकारी क्षेत्र की वित्तीय कंपनियों जैसे पीएफसी और आरईसी पर ज्यादा बोझ पड़ने की आशंका जताई गई है। साथ ही बैंकों के लिए कर्ज की लागत में भी वृद्धि होने और कर्ज के महंगा होने की भी बात कही जा रही है। केनरा बैंक के सीएमडी और सीईओ के सत्यनारायण राजू का कहना है, ”हमें प्रस्तावित नियमों को लेकर और ज्यादा स्पष्टीकरण की जरूरत है। इसमें समायोजन की अधिकतम राशि क्या होनी चाहिए, इसको स्पष्ट करने की जरूरत है। वैसे इस प्रस्ताव से केनरा बैंक पर अतिरिक्त वित्तीय असर पड़ने की संभावना नहीं है।” वह केनरा बैंक के वित्तीय परिणाम जारी करने के बाद आयोजित प्रेस कांफ्रेंस को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने बताया कि परियोजनाओं को उनके बैंक ने कुल 1.10 लाख करोड़ रुपये का लोन दिया है। अगर आरबीआई का प्रस्तावित नियम लागू हो जाता है तो बैंक को 5,000 करोड़ रुपये की अतिरिक्त राशि का समायोजन करना पड़ सकता है। समायोजन की राशि बैंक अपने मुनाफे से करते हैं। दैनिक जागरण ने कुछ दूसरे बैंकों से भी बात की है और उन्होंने भी कहा है कि इस बारे में भारतीय बैंक संघ (आईबीए- बैंकों का संगठन) की तरफ से आरबीआई व वित्त मंत्रालय से बात की जाएगी।

 

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