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घरेलू हालात मजबूत लेकिन वैश्विक अनिश्चितता से बढ़ी चिंता: RBI

नई दिल्ली। देश की अर्थव्यवस्था लगातार मजबूत हो रही है और ग्रामीण क्षेत्रों में उत्पादों की मांग की जो कमी पिछले दो-तीन वर्षों से देखी जा रही थी। यह भी अब दूर होने लगी है, क्योंकि वहां गैर-खाद्य उत्पादों की मांग शहरों से भी ज्यादा बढ़ी है। ऐसे में देश की अर्थव्यवस्था पूरी तरह से नई छलांग लगाने को तैयार दिख रही है। बस एक समस्या सामने दिख रही है वह है वैश्विक स्तर पर बढ़ती अनिश्चतता। भू-राजनीतिक स्तर पर भी गतिविधियां परेशान करने वाली हैं और वैश्विक इकोनॉमी में अपेक्षित सुधार भी नहीं हो रहा। ऐसे में भारतीय रिजर्व बैंक को भी काफी सतर्क रहना होगा। यह बात 21 मई, 2024 को आरबीआइ की तरफ से अर्थव्यवस्था की स्थिति पर जारी रिपोर्ट में कही गई है। डिप्टी गवर्नर एम डी पात्रा की तरफ से तैयार यह रिपोर्ट ब्याज दरों को लेकर भी संकेत देती है कि इसमें कमी होनी तय है, यह कमी कब होगी, इसका फैसला किया जाना है।रिपोर्ट में कई आंकड़ों के जरिए यह साबित किया गया है कि किस तरह से ग्रामीण क्षेत्र में मांग बढ़ी है।जैसे दोपहिया वाहनों की बिक्री अप्रैल, 2024 में जबरदस्त रही है। रोजाना होने वाले पेट्रोलियम खपत में 6.1 फीसद की वृद्धि हुई है। पिछले दो वर्षों में पहली बार एफएमसीजी उत्पादों (पैक्ड खाद्य उत्पाद, साबुन, तेल, पेस्ट, प्रसाधन सामग्राी या घरों में इस्तेमाल होने वाले दूसरे गैर खाद्य सामान) की मांग शहरी क्षेत्रों से ज्यादा रही है।शहरी क्षेत्रों मे दर्ज 5.7 फीसद के मुकाबले एफएमसीजी उत्पादों की मांग ग्रामीण क्षेत्रों में 7.6 फीसद रही है। कारों व दोपहिया वाहनों की मांग में आई तेजी को भी ग्रामीण क्षेत्रों की बेहतर स्थिति से जोड़ कर देखा गया है। इस आधार पर रिपोर्ट में कहा गया है कि, “भारत में यह उम्मीद और मजबूत हुई है कि बहुप्रतीक्षित आर्थिक उन्नति का दौर अब शुरू होने वाला है।”
बढ़ रहा कर्ज चुकाने का संकट
रिपोर्ट में दुनिया में बढ़ते कर्ज और इसके संभावित खतरे को लेकर भी आगाह किया गया है। इसमें कहा है कि वैश्विक स्तर पर कर्ज चुकाने का एक बड़ा संकट पैदा होता दिख रहा है। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आइएमएफ) की एक रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा है कि दुनिया पर अभी 2,35,000 अरब डॉलर का कर्च है जो सभी देशों के संयुक्त सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का 238 फीसद है। लेकिन इसके साथ खतरा यह है कि दुनिया के आधे से ज्यादा देशों में चुनाव हो रहे हैं जिसकी वजह से कई देशों में राजकोषीय व्यवस्था को सुदृढ़ करने को दरकिनार किये जाने की संभावना है।
दूसरा खतरा महंगाई की वजह से पैदा हो रही है। महंगाई से लड़ने की वजह से देशों के साथ कर्ज चुकाने की क्षमता कम हो रही है। ऐसे में कर्ज चुकाने की स्थिति ठीक नहीं होती है तो इसका असर कई देशों की रेटिंग पर होगा, जिसका असर पूरी दुनिया पर पड़ सकता है। इससे दिवालिया होने की घटनाएं बढ़ सकती हैं।
अंत में रिपोर्ट कहता है कि अगर कर्ज का यह संकट बहुत ही बढ़ता है, तो पिछले एक दशक में जो प्रगति हासिल की गई है, उस पर भी पानी फिर सकता है। इस संदर्भ में भारत में कर्ज की स्थिति का ब्यौरा नहीं दिया गया है, लेकिन साथ ही महंगाई के कुंद पड़ते धार को बहुत ही सकारात्मक बताया गया है। इससे ब्याज दरों में कमी की संभावना है। वैसे पहले ब्याज दरों में जितनी जल्दी कटौती होने की संभावना थी, वैसी स्थिति अभी नहीं है। यानी कर्ज को सस्ता बनाया जाएगा, लेकिन अभी थोड़ा वक्त लगेगा। सनद रहे कई एजेंसियों ने कहा है कि भारत में ब्याज दरों में कटौती वर्ष 2024-25 की अंतिम छमाही में संभव है।

 

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